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मैं न चुप हूँ न गाता हूँ __अटल बिहारी वाजपेयी

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                   न मैं चुप हूँ न गाता हूँ सवेरा है मगर पूरब दिशा में घिर रहे बादल रूई से धुंधलके में मील के पत्थर पड़े घायल ठिठके पाँव ओझल गाँव जड़ता है न गतिमयता          स्वयं को दूसरों की दृष्टि से         मैं देख पाता हूं        न मैं चुप हूँ न गाता हूँ समय की सदर साँसों ने चिनारों को झुलस डाला, मगर हिमपात को देती चुनौती एक दुर्ममाला,           बिखरे नीड़,           विहँसे चीड़,          आँसू हैं न मुस्कानें,          हिमानी झील के तट पर         अकेला गुनगुनाता हूँ।         न मैं चुप हूँ न गाता हूँ.   मौत से ठन गई / अटल बिहारी वाजपेई upsc aspirant shayari                           BUY NOW               ...

पंद्रह अगस्त की पुकार / अटल बिहारी वाजपेयी

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  पंद्रह अगस्त का दिन कहता:   आज़ादी अभी अधूरी है।   सपने सच होने बाकी है,   रावी की शपथ न पूरी है॥   जिनकी लाशों पर पग धर कर   आज़ादी भारत में आई,   वे अब तक हैं खानाबदोश   ग़म की काली बदली छाई॥   कलकत्ते के फुटपाथों पर   जो आँधी-पानी सहते हैं।   उनसे पूछो, पंद्रह अगस्त के   बारे में क्या कहते हैं॥   हिंदू के नाते उनका दु:ख   सुनते यदि तुम्हें लाज आती।   तो सीमा के उस पार चलो   सभ्यता जहाँ कुचली जाती॥   इंसान जहाँ बेचा जाता,   ईमान ख़रीदा जाता है।   इस्लाम सिसकियाँ भरता है,  डालर मन में मुस्काता है॥   भूखों को गोली नंगों को   हथियार पिन्हाए जाते हैं।   सूखे कंठों से जेहादी   नारे लगवाए जाते हैं॥   लाहौर, कराची, ढाका पर   मातम की है काली छाया।   पख्तूनों पर, गिलगित पर है   ग़मगीन गुलामी का साया॥   बस इसीलिए तो कहता हूँ   आज़ादी अभी अधूरी है।   कैसे उल्लास मनाऊँ मैं?   थोड़े दिन की मजबूरी है॥   दिन दूर नहीं खंडित ...

मौत से ठन गई / अटल बिहारी वाजपेई

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ठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आज़मा। मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर। बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं। प्यार इतना परायों से मुझको मिला, न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला। हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए। आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है। पार पाने का क़ायम मगर हौसला, देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई। मौत से ठन गई। 🙏🙏🙏                                BUY NOW